फ़ॉलोअर

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

मिट न सकी...अंशू सिंह


मिट न सकी

अंतहीन भूख
अभ्यंतर से 

मेरे अभ्यंतर से 

बार बार पुनः
जन्म हुआ
चाहिये मुझको 
भरपाई
तृप्त भरपाई 

संकीर्ण से अनंत
तक की प्यास 
पुनः बुझानी है

कालविजयी दशाओं में
अक्सर भूखा था
उस रोज़ 
और प्यासा था 

जब फूटती थी
एक विशाल नदी
प्रवाही मन से 

निशब्द है ज़ुबान
आज 

भूख व्यक्त नही करती
उगती है
विलीन हो जाती है 

पर हर पहलू
एक भूख है 
अंतहीन भूख

-अंशू सिंह
जन्म 30 अक्टूबर 1987
वाराणसी काशी हिन्दू वि वि 
से स्नातक एवं स्नातकोत्तर

5 टिप्‍पणियां:

  1. गहन, बहुत बहुत गहन। चन्द शब्दों में अंतर्मन को झकझोरना कतई आसान नही होता। बहुत सुंदरतम

    जवाब देंहटाएं
  2. ज़िन्दगी की कश्मकश से गुज़रती संवेदना को झिंझोड़ती ऐसी कविता जो नयापन लिए है।
    बधाई एवं शुभकामनाऐं।
    आदरणीय यशोदा बहन जी हार्दिक धन्यवाद पाठकों को उत्कृष्ट रचना वाचन के लिए प्रस्तुत करने हेतु।

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 16 सितम्बर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-09-2017) को
    "चलना कभी न वक्र" (चर्चा अंक 2730)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं

14...बेताल पच्चीसी....चोर क्यों रोया

चोर क्यों रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया?” अयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज करता था। उसके राज्य में रत्नदत्त नाम का एक सा...